Monday, 16 January 2012

सलाम ए बेइज्जती .....


रस्ते में जाते हुए आज उसे बड़ा ताज्जुब हो रहा था I
कोई उसके सामने हाथ जोड़ रहा था कोई आकर दंडवत प्रणाम कर रहा था I
बंशी घबरा भी रहा था ओर एक तरफ उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना न था, क्यों की आज तक उसने सिर्फ लोगो के ताने ही सुने थे ..या खूब सारा बोझ दोय था और यही गधो की फितरत भी होती हैंI  हाँ बंशी एक सीधा साधा पर मह्त्वकंशी गधा था, इसीलिए आज इतनी इज्जत पाकर उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना न था ..मन ही मन सोंच रहा था चलो आज आखिर लोगो को मेरी अहमियत का अंदाजा हो ही गया I
ऐसे ही रस्ते भर वह और ज्यादा अभिमान के साथ चलने लगा , सीना तन के , आँखे चदा के , आसमाँ में  देखते हुए , अभिमान में चकनाचूर ..नशे  में चूर I
कुछ देर बाद वह नदी के किनारे खड़ा था ..रास्ता खतम हो चूका था I  बंशी सोंच रहा था सायद अब लोग उसकी और इज्जत करेंगे ..नहलायेंगे धुलायेंगे ..माला चढ़ाएंगे और शायद उसके पेरो में गिर के आशीर्वाद लेंगे जैसा की रस्ते भर कई लोग कर रहे थे I
पर जो हुवा वो तो बड़ा ही विस्मयकारी और हताश करने वाला था, उसके ऊपर से सारा बोझ उठा कुछ लोग नदी की और चल दिए ....अब बंशी की तरफ की तरफ कोई देख भी नही रहा था सारी इज्जत और प्रणाम अब उस उसकी पीठ से उठाये बोझ को मिल रहा था I
हाँ उसके तन पे सायद ये लोग आज किसी देवता की मुसरत बिठा क लाये थे ..और ये सारी इज्जत और प्रणाम उसी को मिल रहे थे I
बंशी को ये देर में समझ आया था ...की ये दुनिया तुम्हे नही तुम्हारे द्वारा उठाये हुए बोझ को या तुम्हारे द्वारा पहने हुए तमगे को सलाम करती हे ...जो की नदी के किनारे जाने पे उतर जाने हैं ..पर अब क्या अब तो बंशी को सलाम पाने की आदत हो गई थी ..

Sunday, 1 January 2012

वो साल दूसरा था .. ये साल दूसरा हे...


शुरू करते हैं ...नये साल की शुभकामनाओ की औपचारिकता से...



भाईयों या  बहनों (if any )

बड़ों या  छोटों (if any )

दुश्मनो  या  दोस्तों (if  any )

देशद्रोहियों या  देशभक्तों (if any )

आधुनिक  या परम्परावादी (if any )

मौजी या परमानंदी (if any )....

(if  any  इसलिए क्यों की ये कम ही हैं ...और इनकी जनसख्या हर साल विलुप्त होती जा रही है - २०१२ के अंत तक बहुत तो पूर्णतया विलुप्त हो चुके होंगे)...खैर

सबको मुबारक हो नया साल ..नई उम्मीद ..नये सपने ..नये अपने ..कुछ को  सूरज की तपन मुबारक , कुछ आने वाली सर्दी की सुगबुगाहट मुबारक ...कुछ को गरीबी मुबारक कुछ को अमीरी का एहसास मुबारक (क्यों की ये सिर्फ एहसास ही हो सकता हे इन हालातो मैं),

कुछ यूँ कहूँ की जीने वालो की जिन्दादिली मुबारक और जो जीते जी मर रहें हैं...उन्हें जिन्दगी भर मौत की सोत मुबारक I

प्यार करने वालो को तनहाइयाँ मुबारक (क्यों की अक्सर वो ही हाथ आना है ) ..

और नफ़रत करने वालो को जलता जीवन मुबारक.

समाज के ठेकेदारों को चोबीस घंटे सत्ता की चारपाई के लिए होने वाली हाथापाई मुबारक,
और
बाकि समाज को बची चारपाई  मुबारक ..

जो छुट गये हैं ..
उन्हें मेरी लापरवाही मुबारक ..जो याद आ गये उन्हें मेरी यारी  मुबारक I

जनवरी की शुरुआत कुछ इसे ही सपनों से की होगी आपने भी मेरी तरह ...मंदिर में सुबह की आरती मे झूमकर  या दोस्तों की यारी  में झूमते हुए घूमकर I

बड़े बड़े सपनों के साथ या कुछ करने की तम्मनाओ के साथ, किसी ने आगे बढने के होसलें जमा किये होंगे किसी ने पीछे न रह जाने के I

बच्चों ने जवानी के दरवाजे आजादी  या  कहानी की उम्मीद मे खटखटाए होंगे I

जो जवान बिना कहानी के थे
उन्होंने
शायद सीधे सादेपन के कपडे बदले होंगे  ...बालो की बनावट बदली होगी या उनका रंग ..किसी चमक की चाहत में प्रोडक्ट या  ब्रांड बदले होंगे I

सुन्दरता की आरजू मे - लड़कियों ने ब्यूटी पार्लर बदले होंगे
या

मर्दानगी की चाहत मे -लडको ने जिम ट्रेनर,

जितने की चाहत मे - नेताओ ने  पार्टियाँ

या

खुशी की चाहत मे - दोस्तों ने दोस्त

TRP की चाहत मे- लेखकों और मीडिया ने विषय

या

पास होने की चाहत मे -विधार्थियों ने टीचर

जिन्दा रहने की चाहत मे - मछलियों ने तालाब, चिड़ियाओं ने घोषलें और कुछ इंसानों ने देश

या

ढलते जवानी  ने ..बालों और जिन्दगी के रंग,

और

शायद हार जाने वालो ने  बदल ली होगी  चेहरे की उमंग I

तुमने भी हाँ कुछ तो बदला ही होगा ..क्यों की बदलना सच हे ..ठहरना झूठ ...

हम साल के बाद नही साल के साथ बदलते हैं

हर नई किरण के साथ, हर ढलती शाम के साथ ..

हर अपने  खास के साथ या मिलने वाले आम के साथ

हर किसी का बिछुड़ना, या किसी का मिलना,

किसी की हसीं
या
किसी का रोना ..
या
हर नया ख्याल
या
किसी चीज का मलाल ..सब तुम्हे बदलते हैं ...
बस तुम तो ये सोचों की बदलना केसे हे,
बदलना नही हे ये तो  सोंच ही गलत है i

तुम ये निर्धारित करो जाना कहाँ हैं ,,न की जाना हे या नही i

कहानी :-

आगे पीछे दायें बाएं ..गाडियों की लम्बी  कतार ..60 , 70 , 80  100  ..सबकी स्पीड इतनी थी की समझ नही आ रहा था ..आगे जा रहे हे या पीछे ...
राजू की गाड़ी भी धीरे नही चल रही थी ..80  ..90  ..accelerator , clutch , ब्रेक..ब्रेक ..ब्रेक...ओह पीछे से कोई टकरा जायेगा..
accelerator  ..  जल्दी चलाओ सब कितने आगे निकल गये हैं...नीता चिल्लाई I

राजू बोला --इतनी तेज चला तो रहा हूँ देखो ना हम कितनी दुरी, तय कर चुके हैं I

"दुरी तय करने से कुछ नही होता ...लोगो से आगे निकलो " नीता झल्लाते हुए बोली I

इतने में चौराहा आ गया ..
रोजू बोला " थोडा रुक कर सोच लेते हैं जाना किधर हे?"

"दिमाग ख़राब हे  तुम्हारा ..इतना वक़्त नही हैं, पीछे रह जाओगे ..सीधे चलते रहो बस" ..मैडम का सुझाव आया I

राजू को लग रहा था ..भले ही स्पीड तेज हो पर वह शायद गलत रस्ते पर जा रहा हैं I

इतने में ...एक झटका उसके हाथ को लगा और उसके हाथ स्टीरिंग से अलग थे i 
नीता समझाते हुए बोली..." एक काम  करो तुम बहूत सोंच रहे हो, स्टीरिंग में सम्भालती हूँ और तुम accelerator  और break  पर ध्यान दो i "

राजू हक्का बक्का सा रह गया ... और कुछ ही देर में गाड़ी तेज गति से चल रही थी...
पर
थोड़ी समय बाद...कभी राईट, कभी लेफ्ट ..कभी इस रोड में कभी उस लेन में ...राजू और नीता दोनों परेशान थे ...हाँ पर राजू कुछ ज्यादा ही..

क्योंकी

नीता को तेज गति खूब भा भी रही थी..

ऐसा पुरे साल चलते रहा ..
अब
राजू ...अन्दर से घुटन  सी महसूस कर रहा था...
उसे
जल्दी नही ..सही जगह पहुंचना था
उसे
लोगो की स्पीड की तुलना में नही अपने सफ़र की तुलना में जीना था
उसे
मंजिल के मौज की परवाह नही  ..रास्तों के  आनंद में जीना था
क्योंकी
वो जनता था ..या उसे पता था ..
मंजिल तो एक दिन ही मौज देगी..ता-उम्र तो रास्तो पे ही गुजरना हैं
..
और फिर
वो चिल्ला दिया ...."नीता में स्टीरिंग खुद सम्भालना चाहता हूँ'

"पर पुरे साल तो मेने सम्भाली हे ..तुम्हारी गाड़ी की बागडोर ..अब क्या हो गया ?" नीता ने पूछा

और राजू के मुंह  से अल्ताफ (राजा) के ये उल्फाज अनायास ही निकल गये......

"नीता ...लेकिन क्या बताऊ ..
तब हाल दूसरा था , अब हाल दूसरा हे
अरे वो साल दूसरा था से साल दूसरा हे ......



क्या सिखा :-

हाँ हार साल के आखरी मे बदलाव की दिशा को देख लेना  एक अच्छी सोंच हे ..

क्यों की

आजकल बदलाव की गति इतनी हे की हालात उस बेलगाम गाड़ी की तरह हो गये हैं ,,,
जिसका
accelerator  इतना फास्ट हे की, हम सिर्फ ब्रेक लगाने मे ही रह जाते हे ...कभी अपनी गाड़ी मे ..कभी दोस्तों की गाड़ी मे ..

अभिभावक (parents ) बच्चों की गाड़ी मे ..

पति पत्नी की गाड़ी मे ,,और कभी कभी ..पत्नी पति की गाड़ी मे ...

और इस ब्रेक की आपाधापी मे स्टीरिंग  (steering ) भुला दी  जाती  हैं ...
अक्सर गाड़ी घुस जाती हैं
कभी पडोसी की गाड़ी मे ..
कभी किसी और रोड मे ..
कभी खाई मे
और कभी कभी ..पता चलता हे ..हमारे जीवन की गाड़ी की स्टीरिंग ही किसी और ने हाथ मे लेली है ....

और हाँ ये अक्सर होता है I
तो साल की शुरुआत करते हैं ..अपने स्टीरिंग का विशलेषण करके ....

तो फिर ये माहे जनवरी हे ...कुछ यद् आ रहा हे
तुमने  खूब संभाली स्टीरिंग मेरी....

लेकिन क्या बताऊ ..
तब हाल दूसरा था , अब हाल दूसरा हे
अरे वो साल दूसरा था से साल दूसरा हे ..

Nothing related with gender and enjoy with song ....

https://www.youtube.com/watch?v=YvMD1VjsARo


Monday, 26 December 2011

चले हम संत से संता की और .....



दद्दू  कैसे हो ..सुना है आजकल ब्रजेश भाई अमेरिका चले गये हे ..मेने इधर से पूछा I

हाँ..तुने सही सुना हे ..आठ महीने हो गये हैं उसे गये. अभी तुजसे पहले उससे ही बात हो रही थी  ..दद्दू फ़ोन पे बोले  I

"अच्छा और क्या हाल हैं उनके ...क्या कह रहे थे ब्रजेश भाई" मेने उत्सुकता के साथ पूछा  I
बता रहा था कल घुमने गये थे रात में ..कुछ किसमस (क्रिसमस ) हे वहा पे ...बोल रहा था  बड़े बड़े संत (असलियत में संता ) आये हे सुना हे अमेरिका में ..." भाई ये अच्छा हे ...अमेरिका में भी संतो के दर्शन हो जाते हैं" दद्दू ख़ुशी से बोले ..में बस अन्दर से मुस्करा भर दिया और बोंला अच्छा दद्दू ये तो बताओ ब्रजेश भाई के दोनों बच्चे कहाँ हे ...वो तो यही हैं न ?
हाँ हे तो यही पर कल दिन भर घुमने गये थे ...बोलकर  गये थे .. कोई संता को देखने जा रहे हे  I  में तो परेशान हो गया हु अब इंतजार करते करते , अब तक नही लोटे हे दोनों के दोनों I
(उनकी आवाज में थोडा भारीपन था )
"फिक्र मत करो दद्दू आ जायेंगे वेसे भी घर में क्या काम  हैं घुमने दो उन्हें ..कुछ देर " ..मेने समझाते हुए  कहा  I
दद्दू बोले भाई दीपक ऐसे मुझे कोई  परेशानी नही हैं, तू भी जानता हे ..पर बात ये हे की घर पे २ दिन से बहुत  बड़े संत आये हुवे हे ..आजाते तो उनका आशीर्वाद ले लेते ..२-४  ज्ञान की बात सुन लेते  I
पर ये बच्चे समझते कहा हे....ब्रजेश को बोंला था इनसे कम से कम फ़ोन पे ही बात करले कुछ देर ..बोला अभी टाइम नही हे....संता के यहाँ  जाना हैं, देर हो रही हे  I
में क्या समझाउं अब ..बच्चे बोलते हे बाबा ...संता खूब चीजे देने आता हे.
मेने कहा बेटा कुछ एसा करो की लेने वाला आये तो तुम्हे मजा आये  ..देने वाले को देखके मजा आना तो दरिर्द्ता का सूचक हे,,,,,चले सब "संत से संता की और समृधि से दरिद्रता की और" ..कहके दद्दू ने फ़ोन और क्रिसमस की भीड़ से मुझे काट दिया  I
(some example to see the same .....  https://twitter.com/#!/fart )

क्या सिखा :----
बेहतर होगा इस बार आप बताये ......

Saturday, 24 December 2011

अपना दिल न जलाओ..अक्ल लगाओ


राजेंद्र नाम ही गलत हे उसने मुझसे कहा..मेने पूछा क्यों भाई नाम तो बड़ा सही हे ..राजा इन्द्र से बना हे तुम्हारा नाम I
"हाँ सही हे ..और इन्द्र के घर में आग भी लगने वाली हे थोड़ी देर में ..खुद में ही लगाऊंगा " राजा इन्द्र"..तुम देखते रहो बस I
मैं फिर पूछ बैठा भाई ऐसा क्या हो गया की तुम अपने घर में आग लगा रहे हो I
यार दीपक तुम्हे दीखता नही कितना कूड़ा इखत्ता हो गया हे घर में ..
मेने कहा ..तो इसे हटाने के और भी तरीके हैं I
"यही कहोगे न की साफ करलो " वो तपाक से बोल उठा .
मेने कहा हाँ कर सकते हो ...भाई ये जीतेन्द्र, रमेश और रिंकू के घर हैं न हमारे पडोस में ..वह से आता हे ये कूड़ा I
कब तक साफ करूंगा ..इसीलिए सोच रहा हु आग ही लगा देता हु आँगन में जेसे ही कूड़ा आये साफ.
मेने कहा यार तो और भी तरीके हैं इससे निज़ात पाने के I
" बोलो तुम भी अपनी राय देलो .. तुम्हारा भी मन हल्का हो जायेगा.. रायचन्दो की कमी नही हे ..चिडते हुए बोला I
में भी कहाँ मानने वाला था नेक विचार रखने से ...बोला
यार एसा कर सकते हो की
एक चारदीवारी बना लो ..कूड़ा आने का सवाल ही नही
या
एसा करो की पड़ोसियों को समझाओ की उनके घर का कूड़ा साफ करे ..आदत डाले I
और
इतने ही गुस्से में हो तो कुछ एसा करो की ..वो लोग अपने घर में आग लगाये उनके घर की गंदगी के लिए अपने घर में आग ...समझदार तो एसा नही करेंगे कभी

बाकि रुम्हारी मर्जी राजेंद्र भाई ..में चलता हु वरना घर में टाइम पे नही पहुंचा तो वहा आग लग जाएगी हेहे ...


क्या सीखा :
दोस्तों हम सब ये खूब करते हे ,,,कोई और बुरा आदमी हे तो हम परेसान  हो जाते हे..अक्सर अपने दिल में आग लगा के घूमते रहते हे ,,की फ़लाने की वजह से मेरा दिमाग गरम हो रहा हे ....में परेशान हु की वो कितना बुरा आदमी हे..क्या फर्क हे ..राजेंद्र में और हममे ..जानता हु तुम मुझे रायचंद कहोगे ..हेहे कोई नही कहलो .. पर मेरी सब राजेन्द्रो से ,,यही सलाह हे ...गेरो की गलती को लेके ..अपने घर ( दिल ) में आग न लगाओ ..अक्ल लगाओ अक्ल लगाओ ...@learn from stories ,,,
उन तनहा यादों के साथ मेरे एहसास तिनका तिनका बिखरते जाते है.
मेरी नादानी हे की करता हु कोशिश सहजने की ....जरा, कुछ,  चंद कभी हाथ आते हैं
पर फिर तेरी यादों के हसीं झोंके मेरी मुट्ठी से हर तिनका छुड़ा ले जाते हैं/
ये हरकते कभी जाने में होती हे...होती हे कभी  उन्जाने में.....कभी सुने में करते हे कभी सरेआम होती हे ..दर्द तो तब होता हैं जब इनसे तू बदनाम होटी हे ...